क़लम के भीतर(आध्यात्मिक)-143

क़लम के भीतर में 

भरी है काली स्याही

तभी तो जब देखो वो 

दर्द ही उगलती है

बर्तन में कुछ भी रखकर 

जब आग पर चढ़ाते हैं

उबल-उबल कर बाहर 

बह निकलता है जो भीतर

भरा हुआ था बर्तन के

मेरे बासन में भी कुछ ऐसा ही

भर दिया तुमने....

जितना उबलता है दर्द ही निकलता है

कुछ ऐसी आग और कुछ ऐसा बासन

फिर से बनाया जाये

डालो कुछ भी उसमें भले ही

मगर बनावट ही निकल कर आये

जो ख़ुशी से सबको भाये 

                   👣🙏🏻


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुछ यूं है तेर शुकराना-429

शुकराना -424

याद आपकी-428