भीड़-भाड़(आध्यात्मिक)-131

भीड़-भाड़ की दुनिया दाता 

मुझको अब नहीं सुहाती है

लोक-लाज सब छोड़ के अब तो

तेरी अदा ही मन को भाती है

बदरंगे हैं दुनिया के रँग सब

तेरा रँग ही सुहाना लगता है

छोड़ के सारे रिश्तों को अब

तेरे ख़्वाब में ही मन रमता है

झूठा-झगड़ा तेरा-मेरा सब

नाम-प्रसिद्धि,पद और प्रतिष्ठा

भाग रहे सब इसके पीछे-पीछे

लेकर जानी है अन्त में बिष्ठा

तुझसे जुड़कर भी बन्दों में 

ये अकड़ कहॉ से आ जाती है

तुम तो इतने करुणामई हो

इनकी करुणा कहॉ खो जाती है

                       👣🙏🏻


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