नारी दिवस(सामाजिक)-187
तारीफ़ों के पुल बॉध-बॉध कर
सबने तुझको खूब रिझाया है
लेकिन आज भी सोच-सोच कर
मेरा मन अब भी क्यूँ घबराया है
कब तक दो राहों पर इसी
तरह से खड़ी रहेगी नारी
शादी से पहले पिता का घर
शादी हो गई पति का घर
पहले भाई पीकर आता था
अब पति भी पीकर आता है
वहॉ भी ग़ुस्सा झेला करती
यहॉ भी पिटाई पड़ जाती है
ज़्यादा बच्चे उसकी ग़लती
बच्चे ना हों बॉझ है बनती
कमा-कमाकर पेट है भरती
फिर भी......वो घर
पति का घर कहलाता है
कब तक दर्द सहेगी नारी
मुझको समझ न आता है
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