जितनी गाथा कहूँ तुम्हारी(आध्यात्मिक)-163
जितनी गाथा कहूँ तुम्हारी,
उतनी ही बढ़ती जाती है ।
साथ तुम्हारा,बात तुम्हारी,
सब कुछ याद दिलाती है ।
--नख से सिर तक ध्यान तुम्हारा,
हरदम बना ही रहता है ।
चरणों के चरणामृत का मुझको,
स्वाद बना ही रहता है ।
--तिलक लगाना फूल चढ़ाना,
चरणों में फिर सिर को झुकाना ।
सामने बैठे हो तुम मेरे,
उस पल की क्या बातें बताना ।
--स्वर्ग का मुझको पता नहीं है,
मरने के बाद ही मिलता होगा ।
जीते जी का स्वर्ग मिला है,
सबको जो ना मिलता होगा ।
👣🙏🏻
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