राधा-मीरा(आध्यात्मिक)-177
राधा-मीरा लल्ला-राबिया,
कितनों ने तुझे पुकारा है ।
जँगल-जँगल उन्हें घुमाकर,
कितना उन्हें भटकाया है ।
--याद में तेरी रो-रोकर वो,
रात बिताया करती थीं ।
तेरे भरोसे छोड़के सबको,
गीत प्यार के गाती थीं ।
--प्यार की टीस..तुम क्या जानो,
केवल विरह दिया सबको ।
अपनी बातें याद दिलाकर,
कितना तड़पाया सबको ।
--ऐसी लगन लगाता क्यूँ है,
जब निभा नहीं पाता है तू ।
घुमा प्रेम की वादी में फिर,
विरह की आग लगाता तू ।
--सच्चा अब तो कर दो वादा,
छोड़ कहीं ना जाओगे ।
जब भी याद में तड़पूँ तेरी,
मुझको पास बुलाओगे ।
.........अपने गले लगाओगे ।
👣🙏🏻
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