गुरु के हाथों की कठपुतली(आध्यात्मिक)-191

गुरु के हाथों की कठपुतली,

गुरु ही मुझको चलाते हैं ।

लेकिन जीव समझ ना पाता,

कैसे वो धागा घुमाते हैं ।

ख़ुद को कर्ता मानता है वो,

रोता और चिल्लाता है वो ।

कर्तापन के अंहकार में,

फँसता ही जाता है वो ।

दाता बनकर पुण्य कमाकर,

कैसे अंहकार में जीता है ।

पाप कर्म का शोक मनाकर,

बन्धन में वो बँधता जाता है ।

कितनी शुध्द स्वरूप आत्मा,

कितना वो रोती बिलखती है ।

पाप-पुण्य के संस्कार डालकर,

हमेशा लेन-देन में वो फँसती है ।

जो होना है होकर ही रहेगा,

उसको कौन टाल सकता है ।

तुम ख़ुश रहो गुरुकृपा पर केवल,

वो ही तुम्हें बचा सकता है ।

.............केवल वही बचा सकता है ।

...................बँधन मुक्त करा सकता है ।

                              👣🙏🏻

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