सृष्टि खेलती राग रँगों से(आध्यात्मिक)-196
सृष्टि खेलती राग-रँगों से,
फागुन में खेल ये खूब होता है ।
रँग-बिरँगी ओढ़ चुनरिया,
धरती का मन भी डोला करता है ।
जीवों के भीतर राग-रागिनी,
नव सँगीत गुन्जाते हैं ।
भीतर के सँगीत की लहरें,
उत्सव के रूप में आते हैं ।
रँगों का ये पर्व है होली,
हर इँसान रँगा है रँग में ।
दुनिया के इस रँग-मँच पर,
अपनी अदायें करते हैं ।
कलर-थैरेपी करके भी हम,
रँगों से जुड़ते जाते हैं ।
तरह-तरह के रँगों को हम,
अपने जीवन में अपनाते हैं ।
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