ऑखिन देखी(आध्यात्मिक)-178
पड़ोस में रहने वाली एक सहेली
ना जाने किसने उसके कानों में
दूसरी पक्की सहेली के ख़िलाफ़
ज़हर भर दिया ना जाने क्या कहकर
आना जाना तो बन्द हुआ ही
बोलचाल भी लगभग बन्द ही हो गई
पहली सहेली के घर वाले भी दूसरी
सहेली से नफ़रत करने लगे
काफ़ी सालों बाद अचानक ही
पहली सहेली की मौत हो गई
अब वो बार-बार स्वप्न में
आने लगी दूसरी सहेली के...
प्यार से बार-बार घर पर बुलाने लगी
दूसरी सहेली समझ नहीं पा रही थी
कि अब इसे क्या हो गया
जीते जी पूछा नहीं
मरने के बाद में ये दशा..
आख़िर एक दिन दूसरी सहेली
पहली सहेली के घर वालों से मिलने
पहुँच ही गई उनके घर--लेकिन ये क्या..
माहौल तो पहले जैसा ही है
अब केवल वो ही नहीं है
बाक़ी सब कुछ वैसा ही है
चिन्ता सी सताने लगी है...उस सहेली को
कि यदि...मैं ज़िन्दा रही तो ये सभी
मरने के बाद सूक्ष्म शरीर से
फिर मिलने आयेंगे मुझसे
और यदि मैं पहले मर गई तो
क्या सबसे...ऊपर जाकर मिलना पड़ेगा
स्वर्ग में या फिर नर्क में
क्यों कि नफ़रत की दीवार अभी तक
गिरी नहीं है इन लोगों के मन से
मरने के बाद पश्चात्ताप होगा तो फिर
मिलेंगे सहेली की तरह बार-बार
इसीलिये कहते हैं माफ़ करता चल
न जाने कौन-कब-कहॉ मिले
यहॉ (ज़मीन पर ) मिलें
या वहॉ (मृत्यु के बाद) मिलें
💔💔🖤💔💔
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