सागर किनारे(आध्यात्मिक)-165
यहॉ सागर के किनारे पर बैठी
मैं लहरों को ही तका करती
लगता बस अब तुम आ ही गये
जब लहरें सागर से उठा करतीं
पेड़ों के पत्ते हिलते जब-जब
आवाजें सर्र-सर्र आया करतीं
तब ढूँढने तुमको इधर-उधर
मैं सरपट ही दौड़ा करती
रँग-बिरँगे परिधानों में जब
देश-विदेशी यहॉ घूमा करते
तब मेरी निगाहें उस भीड़ में भी
बस तुमको ही ढूँढा करतीं
अब आ भी जाओ बहुत हुआ
अब रात घनेरी छा ही गई
तेरे ख़याल मुझे आते ही गये
मैं सुध-बुध अपनी खोये रही
👣🙏🏻
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