विरह की आग(आध्यात्मिक)-180
विरह की आग और विरह का प्याला,
क्यूँ मुझको आज पिलाते हो ।
मेरे कन्हैया मुझ पर अपनी,
ये कैसी धौंस जमाते हो ।
--माना प्यार किया तुमने भी,
ख़ूब वफ़ा दिखलाई थी ।
लेकिन छोड़ गये जब मुझको,
तब तो दया न आई थी ।
--याद तुम्हारी कर-करके मैं,
हरपल ख़्वाबों में रहती हूँ
इस मन को कितना समझाऊँ,
कैसे भी ना धीरज धरती हूँ ।
--जग हँसाई किया करे अब,
मैं तो हूँ पगला ही गई ।
दुनिया लगी काम में अपने,
खा-पीकर सब मस्त हुई ।
--तेरी याद और प्रेम के प्याले,
पी-पीकर ही मैं जीती हूँ ।
कैसे बताऊँ तुझको दाता,
किस हाल में अब मैं रहती हूँ ।
...........तेरी राह तका मैं करती हूँ ।
.......तेरी बाट निहारा करती हूँ ।
👣🙏🏻
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