मन के मन्दिर में(आध्यात्मिक)-175

मन के मन्दिर में बैठे हो

अच्छा लगता है मुझको

--न दर्शन के लिये लाइन में लगना

  न ही भारी भीड़ में धक्कों का लगना

--न पुजारी को दिये लड्डुओं को देखना

  न बाहर उतारी चप्पलों की चिन्ता करना

--और भी बहुत सी बातें हैं अन्दर में मेरे

   जिनने बहुत ही बदल दिया है मुझको 

--अब नन्हें बच्चों में, बुज़ुर्गों में, पेड़ों में,

  पत्तों में, झाड़ियों के झुरमुट में, पशुओं में,

--पक्षियों में, जीवों में, जन्तुओं में, ज़र्रे-ज़र्रे में,

   अपना एहसास दिला जाते हो हरदम मुझको ।

        

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