जो भी मन में आता है(आध्यात्मिक)-192
जो भी मन में आता है वो,
बात किये जाती हूँ मैं ।
बातें क्या-क्या की जाती हैं,
समझ नहीं पाती हूँ मैं ।
-कभी तो लगता अनुशासन में,
रहना नहीं आता मुझको ।
आकाश में उड़ते पँछी की क्या,
मर्यादा है ये भान है मुझको ।
-बातों को दिल से छू जाने पर,
अक्सर ही रो जाया करती हूँ ।
तुम तो कहते अतिभावुक,
होने से रोया करती हूँ ।
-ग़ुस्सा होने पर वाणी से मैं,
ज़हर ही उगला करती हूँ ।
तुम कहते डँसने से बेहतर,
ज़हर उगलना अच्छा है ।
-सामने बतला देने पर जो,
अपमानित हो जाता है ।
पीठ के पीछे चर्चायें करना,
सबको बहुत सुहाता है ।
-तुम जो कहते हो वो मानूँ,
या फिर दुनिया जो कहती है ।
धार चीरकर चलने वालों को,
दुनिया कब छोड़ा करती है ।
-तुम्हीं बता दो आज ये मुझको,
पारदर्शिता क्या होती है ।
भीतर कुछ और बाहर कुछ हो,
क्या यही सरलता होती है ।
.....क्या यही सहजता होती है ।
.....क्या यही मधुरता होती है ।
👣🙏🏻
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