ऑखिन देखी(सामाजिक)-159
दिन रात लगी रहती सेवा मे
फिर भी सासू जी ख़ुश ना हैं
रोज़ रोज़ की चिक चिक से
वो हरदम ही रोया करती है
समझ नहीं आता है उसको
कहॉ जाये वो क्या तो करे
मॉ और बाप नहीं दुनिया में
जिनसे वो मन की व्यथा कहे
फैल गया ठोकर से दूध तो
बहू पर लगी चिल्लाने सासू
अँधी है क्या ?दिखता नहीं है
तेरे बाप के घर का है क्या ?
बहू बेचारी चुप थी क्या बोले?
इसी तरह कुछ दिन फिर बीते
एक दिन सास की ठोकर से
घी का डिब्बा बिखरा जमी पर
अब भी सासू उस पर चिल्लाई
अँधी है क्या ? पता नहीं है ?
डिब्बा यहॉ पर रखते हैं क्या ?
ख़र्चा कैसे चलता है ?
तुझे पता क्या ?
कब तक ऐसा होता रहेगा
समझ नहीं आता है मुझको
कहीं बहू पर सास है भारी
कहीं बहू का पलड़ा भारी
💔💔🖤💔💔
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