दिले शायरी-8
--भीड़ कुछ छँटी थी कि दूसरी लग गई
विचारों की इस तरह इक झड़ी लग गई
--कौन मुझे मुआफ़ करे
मैं भी किसको मुआफ़ करूँ
सभी तो मेरे अपने हैं फिर
किस-किस की मैं बात करूँ
--हर रोज़ तेरा ज़िक्र जुबॉ पै रहा करता है
कुछ न कुछ ज़बरन कहलवा ही लेते हो
--दुनिया को चाहा जब तलक ठोकरें लगती रहीं
तुमको चाहा जब से मैंने कुछ तलब उठती नहीं
--ये आशिकी ख़ुदा से है ख़ुद की भी आशिक हो गई
ना जाने कौन घड़ी थी वो जो तेरे दर पर ले ही गई
--तेरा दामन जब से पकड़ा, हर बार मुसीबत टल सी गई
तू साथ रहा हर वक्त मेरे, मैं तुझमें खोई-खोई रही
@शशिसंजय
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