काया तेरी माया तेरी(आध्यात्मिक)-334
काया तेरी माया तेरी,
मन भी तेरा तन भी तेरा ।
काम भी तेरा, धाम भी तेरा,
तेरा ही सब कुछ है तेरा ।
जानबूझ कर मैं-मैं का,
अभिमान उठाये फिरती हूँ।
सब कुछ तेरे बूते चलता,
मैं बोझ उठाये फिरती हूँ ।
चाकर हूँ तेरे चरणों की ,
मालिक होने का भाव मुझे ।
देता है दिन रैन सभी को ,
देते न देखा कभी तुझे ।
मुझको तो कुछ और न चाहिये ,
मैं -मैं मेरी मिटा देना ।
चरण में तेरे पड़ी रहूँ बस ,
सारा भार उठा लेना ।
चलते-फिरते काया मेरी ,
श्वॉस छोड़ दे जिस दिन भी ।
दोनों हाथ उठाकर मुझको,
ले लेना तुम गोदी भी ।
प्राण तुम्हारे हाथ में होंगे ,
ख़ुश होगी मेरी काया ।
चरण तुम्हारे पकड़-पकड़ कर,
बिलख रही होगी माया ।
👣🙏🏻
11/1/18
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें