धुंधली यादें(आध्यात्मिक)-215
मेरी मॉ की कोठरी में तुम,
कैसे बन्द रहा करते थे ।
मेरे कान्हा खड़े-खड़े तुम,
कैसे मुस्काया करते थे ।
धुँधली सी यादें हैं मेरी,
कुछ बीते मेरे बचपन की ।
मॉ जब कहती आरती कर दो,
देखा करती मैं तुम्हें तब भी ।
आरती करती या ना करती,
दीपक जला दिया करती।
तब भी तुम कुछ ना कहते,
मैं देख के ख़ूब हँसा करती ।
ग्यारस(एकादशी) के दिन सत्संग होता,
ढोल मजीरे बजा करते ।
मैं नाच के तुम्हें रिझाती थी,
भावुक हो सब गाया करते ।
तुम्हारी चाहत बचपन से ही,
दिल में गहरे कहीं बैठ गई ।
तभी आज तक पकड़े तुमको,
मैं घुटनों के बल बैठ गई ।
मेरे दाता कितना पुराना,
तेरा-मेरा ये रिश्ता है ।
अब तक तूने ही झेला मुझको,
आगे भी झेलते जाना है ।
👣🙏🏻
31/1/18
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