आंखन देखी(आध्यात्मिक)-212
दाल पकौड़ी, तिल मावे के लड्डू,
गाजर का हलुवा बना है दाता।
आलू कचौरी , दूध और फीणी ,
भोग लगा जाओ मेरे दाता ।
क्या ही..भीड़ रहा करती जब.....,
कोई भी त्यौहार है आता...।
तरह-तरह के भोग बनाकर ,
हर कोई भोग लगाने आता ।
हम...नासमझों के हाथ का खाकर ,
तुम भी वाह-वाह कह उठते ।
भक्तों का दिल बड़े मान से ,
तुम भी ख़ूब रखा करते ।
खाने के शौक़ीन बहुत तुम ,
सबको ख़ूब खिलाते थे ।
रोक-रोक कर सब भक्तों को ,
व्यँजन ख़ूब खिलाते थे ।
"प्रसादी पाकर" जाना तुम सब...,
ऐसे सबको कहा करते ।
पँगत में खाते भक्तों का ,
तुम ही ख़ूब ख़याल रखते ।
ऐसे अब ये कहने वाला ,
कोई नहीं है यहॉ मौजूद ।
वार-त्यौहार पर कम से कम तुम,
दरश दिखा दो फिर से ख़ुद ।
.....प्यारे आ जाओ अब तुम ।
....... भोग लगाओ आकर तुम ।
👣🙏🏻
14/1/18
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