प्रीतम तुम्हारा जाना(आध्यात्मिक)330
प्रीतम तुम्हारा जाना ,
क़यामत ही ढा गया ।
नज़दीक तेरे रहना ,
सभी को रूला गया ।
रूबरू देखने की ,
आदत सी बन गई ,
रूह में उतरने में ,
जान लग गई ।
ख़्वाबों में , ख़यालों में ,
आते हो जब कभी ,
बेशक....उसी तरह ,
बतियाते हो तब भी ।
पर क्या बताऊँ तुमको....,
कुछ लत सी लग गई,
देखूँ न जब तक रूबरू ,
तसल्ली नहीं हुई ।
दिल पर दिमाग़ हर दफ़ा ,
हावी हुआ ही करता है ,
बेचैन मेरे दिल को,
वो ख़ूब ही सताता है ।
इतना गुरेज़ था तो...?
मिले भी भला तुम क्यूँ ?
चाहत में अपनी हमको ,
....यूँ पागल बनाया क्यूँ ।
तुम जानते नहीं हो ...?
क्या हाल है हमारा ?
दिन रात तेरी यादें ,
रहती हैं साया बनकर ।
अब आ भी जाओ दाता ,
इतना भी ना सताओ ।
फिर से दरश दिखाकर ,
मेरा हौसला बढ़ाओ ।
एक बार मेरे सिर पर,
यूँ अपना हाथ रख दो ।
तुम सामने हो मेरे बस ,
इत्मिनान ये दिला दो ।
....आवाज़ दे के मुझको ,
.....फ़िर प्यार से बुला लो ।
.....जादू की झप्पी देकर ,
....मुझे नींद में सुलादो ।
👣🙏🏻
8/1/18
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