तेरी बातों का(आध्यात्मिक)-267
तेरी बातों का हर पल याद आना मुझको,
एहसास-ए-सुकून दिये जाता है ।
तेरे क़दमों में मेरे सर का झुक जाना,
मेरे मन को तसल्ली ही दिये जाता है ।
पता नहीं मुझको तुम्हारे दर पै आने के,
"दस्तूर" भला क्या-क्या हुआ करते हैं ।
मेरी अब तक की तमाम शरारतों को भी,
तुम अपने "दस्तूरों" में मिला देते हो ।
मैंने पूछा भी नहीं कभी,
और तुमने बताया भी नहीं ।
हर "दस्तूर" को मैंने कभी,
अच्छे से निभाया भी नहीं ।
फिर भी तुमने मुझसे कभी,
शिकवा न शिकायत ही की है ।
ना ही तुमने कभी भी मुझसे,
कैसे भी "रिवायत" ही की है ।
जो भी किया.... जैसा भी किया....,
हरदम........मैंने ।
तुमने....हमेशा-हमेशा की तरह,
हर रोज़ मेरा हौसला बढ़ाया है ।
कहकर ये बातें मेरे दिल....,
को...छू लिया तुमने ।
कि हमने....."तुम्हें आज अपने
दिल से अपनाया है"।
कैसे कह दूँ कि तुम,
नहीं हो इर्द-गिर्द मेरे ।
सब कुछ जो भी लिखा है अब तक,
वो तूने ही तो लिखवाया है ।
पूरब और पश्चिम की तरह ही,
तो...विधायें हैं...हमारी-तुम्हारी ।
तेरा मिलना भी....मेरे जीवन में,
कुछ...... इसी तरह आया है ।
👣🙏🏻
25/1/18
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें