तुम्हारे आ जा जाने से(आध्यात्मिक)-274
तुम्हारे आ जाने से.....,
निगाहें नूर की बरसात हुये जाती है ।
दिल की बेक़रारी भी....,
दिले क़रार में बदलती जाती है ।
तुम्हारी रौशनी का पड़ता है,
मुझपै जब भी झरना ।
सिर से पैरों तक की,
ज़मीन खिसकती जाती है ।
क्या करूँ मुझमें नहीं क़ुव्वत,
तुम्हारी रौशनी को सहने की ।
बुझता हुआ चिराग़ हूँ मैं,
बाती भी बुझती जाती है ।
तुम क्या जानो......कैसे ?
गुज़रे है दिन तेरे बग़ैर ।
अब तो आने की आहट भी,
मुझे धोखा दिये जाती है ।
सदियों से तुमने मुझको,
दिया ही भला क्या है ?
रुसवाई ही तो दी है जो,
रुलाती ही चली जाती है ।
भेजोगे किसको फिर से,
कोई ऊधौ भी नहीं है मौजूद ।
भेज के उसको अक़्ल की,
हुनर सिखाई जाती है ।
तुमको भुलाना भी कोई,
खेल आसॉ नहीं मेरे दाता ।
जब भी सोचा-किया मैंने,
फूट-फूट कर रुलाई आती जाती है ।
👣🙏🏻
21/1/18
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें