कान्हा मेरे वंशी तुम्हारी(आध्यात्मिक)-260
कान्हा मेरे वँशी तुम्हारी,
मन को कितना रिझाती है ।
वँशी की धुन सुन के गोपियॉ,
दौड़ी-भागी आती हैं ।
कैसे इशारे होते तुम्हारे,
कैसे तुम उनको बुलाते हो ।
कोई भी उनको रोक न पाता,
चुम्बक ऐसा लगाते हो ।
तेरा इठलाना,तेरी निगाहें,
सब कुछ तेरा है अलबेला ।
तभी को सबको छोड़ भागतीं,
आते ही तेरी मधुर बेला ।
तेरा ध्यान और तेरी प्रीति,
सब कुछ तो कर जाती है।
मनुआ मेरा कहीं न भटके,
ऐसा प्यार वो पाती है ।
दिल के गोकुल,मन की मथुरा से,
तन द्वारिका पहुँचा ही दिया ।
बॉध के सब कुछ प्रेम-पाश में,
रूप निराला दिखा ही दिया ।
मेरे कान्हा इसी तरह तुम,
वशीभूत करते रहना ।
तेरे इशारे चले ये मनुआ,
कसके डोर पकड़े रहना ।
.....ढीली डोर न कभी छोड़ना ।
👣🙏🏻
29/1/18
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