बुदबुदाने की आदतआध्यात्मिक)-264

बुदबुदाने की आदत,
सी हो गई है मुझको ।
जब कभी भी ख़यालों
में तुम आ जाते हो ।

अच्छे-अच्छों को,
पागल बना के छोड़ा है ।
जिसको भी, जब भी,
गले लगाते हो ।

क्या ही कबिरा,क्या ही मीरा,
रैदास रहे हों या राधा ।
किसी को भी कब दुनिया,
से प्यार दिलाया है ।

जिसको तुमने चाहा,
कभी भी जी भर के ।
उसको दुनिया की नज़रों,
से तुमने... ही गिराया है ।

कैसे प्यार जताने की,
आदत है तुम्हारी दाता ।
मुझको तो समझ,
नहीं आई अब तक ।

प्यार भी करो और,
रुसवाई भी कराओ ।
प्यार में ऐसे कोई,
किया करता है कब तक ।

ख़ैर जो भी हो तुम्हें,
सब करने की इजाज़त है ।
तेरा चाहना भी मुझको तो,
ख़ुदा की ही इनायत है ।

कितनी मिन्नतें कीं,
कितने ही गिड़गिड़ाया किये ।
तब जाके किसी तरह भी,
तुम मुझको चाहा ही किये ।

जो भी हो?प्यार करने का तरीक़ा ,
तुम्हारा निराला ही,हुआ करता है ।
तभी तो चाहने वाला हरेक बन्दा तुझपै,
अपनी जॉ निसार किया करता है ।

                              👣🙏🏻
                             27/1/18

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