दिल की टीस(आध्यात्मिक)-256
दिल की टीस को तुम क्या जानो,
तुम कैसे महसूस करोगे ।
देते रहे हो विरह वेदना,
विरह को तुम कैसे जानोगे ।
जिनको तुमने छोड़ा अधर में,
हाल कभी पूछा क्या जाकर ?
भेज दिये ऊधौ को उन तक,
बिलख रहीं थीं जो रो-रोकर ।
हो सकता है तुम्हारे प्यार में,
ऐसी कुछ शर्तें रहीं होंगीं ।
तभी गोपियॉ समझ न पाईं,
कितनी वो तड़पी होंगीं ।
सदियों पुरानी वही भूल.. फिर,
तुमसे इस दिल को लगाने की ।
हम तो आज फिर से कर बैठे,
वो प्यार भी और नादानी भी ।
अब क्या करें..क्या हाल ही होगा,
ये तो तुम ही बता सकते ।
जो भी होगा देखा जायेगा,
अब छोड़ न तुमको जा सकते ।
जो माल भी जिस पर होता है,
वो वही तो बॉटा करता है ।
तेरे पास...तो विरह की गठरी,
तू वो ही बॉटा करता है ।
👣🙏🏻
31/1/18
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