बुत बने रहने की आदत(आध्यात्मिक)-263

बुत बने रहने की आदत,
अच्छी नहीं लगती मुझको ।
जो भी आता है बहुत कुछ,
सुनाकर चला ही जाता है ।

प्यार हो,पूजा हो या,
कोई भी तरीक़े रहे हों ।
कितने ही मंत्र और जंत्र,
कुछ भी कराये गये क्यों ना हो ।

मुस्कुराते रहते हो हर,
समय हर किसी पर भी ।
क्या ग़ज़ब ही आदत है,
तुम्हारी सहते रहने की ।

कभी तो कुछ तो तुम भी,
बोला भी करो काली की तरह ।
जैसे वो अपने राम से,
बोला किया करती थी ।

शायद कमी अभी भी है...?
चाहत में हमारी प्यारे दाता ।
तभी तो गुफ़्तगू की कोई,
राह निकलती ही नहीं है ।

एकतरफ़ा मोहब्बत कभी,
निभाई है किसी ने कब तक ।
दोनों तरफ़ से ही बराबर,
निभाये किया करते हैं ।

एक तुम हो जो मुस्कराभर,
देते हो हमेशा की तरह ही ।
कभी इज़हारे मोहब्बत तो,
तुमसे किया जाता ही नहीं ।

ज़माना अब तो बहुत आगे,
निकल चुका है मेरे दाता ।
हर समय ज़ुबान से इज़हार,
(I love you)किया ही करते हैं ।

ग़र समझ न पाये तुम,
इशारा प्यार का अब भी ।
फिर ना कहना कि अब तक,
हमने तुम्हें बतलाया ही नहीं ।

                     👣🙏🏻
                   27*1/18

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