गंगा दशहरा पर्व ही मेरे(आध्यात्मिक)-252
गंगादशहरा(गायत्रीजयन्ती)पर्व ही मेरे,
जीवन में कुछ लाया था ।
तुमने दरश दिखाकर अन्तर में,
मुझको अपना बनाया था ।
मुझको समझ नहीं थी कुछ भी,
अन्तर्जगत में जीने की ।
तुमने ही आनन्द दिलाया,
अन्तर में रस पीने की ।
मेरे दाता किन शब्दों में,
गुणगान करूँ मैं तेरा ।
क्या से क्या कर दिया है तुमने,
तब से ये जीवन अब मेरा ।
बदल दिया तुमने सब कुछ ही,
साल पच्चीसों पहले ही ।
चरण पकड़ कर रोई थी जब,
ज़िद की थी सँग में रहने की ।
तब से अब तक साथ निभाते,
चले आ रहे तुम कैसे भी ।
मैं भी बराबर शरण पड़ी हूँ,
भार उठाये रखना जैसे भी ।
दुनिया में रहने की अब तक,
अकल न मुझको आई है ।
तभी तो तुमने साथ निभाकर,
मुझ पर दया दिखाई है ।
....दिल में छवि दिखलाई है ।
....अन्तर में ख़ुशी जगाई है ।
👣🙏🏻
3/2/18
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें