तेरे रंग में रंगकर तो मेरी(आध्यात्मिक)-247
तेरे रंग में रंगकर तो मेरी,
काली चुनरिया लाल हो गई ।
रंग डालो मुझको रंग डालो,
शरम से मैं तो लाल हो गई ।
काम का रंग मिटाकर मुझको,
बिना काम की कर डालो ।
दर पर तेरे पड़ी रहूँ मैं ,
मुझ पर ऐसा रंग डालो ।
क्रोध का रंग तो अब तक,
मुझपै ख़ूब चढ़ा मेरे दाता ।
ये रंग भी जड़ से मिट जाये,
क्या ऐसा रंग भी है आता ।
लोभ के रंग की जड़ गहरी हैं,
कैसे तुम उन्हें उखाड़ोगे ।
तन-मन-धन सब रंगा है उसमें,
कैसे तुम उसको छुड़ाओगे ।
मोह का रंग तो और भी गहरा,
मोह ने मुझको सींचा है ।
मोह-मोह के धागे हैं ये,
इनसे कब कोई छूटा है ।
तुम्हारी ताक़त, तुम्हारी शक्ति,
ये सारे रंग छुड़ा सकती है ।
अच्छे-अच्छे रंग डालकर,
मुझको ख़ूब भिगा सकती है ।
....अच्छे से नहला सकती है ।
👣🙏🏻
5/2/18
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