गुरुवर कहती बार-बार हूँ(आध्यात्मिक)-208
गुरुवर कहती बार-बार हूँ,
मैं-मैं ख़त्म न होती क्यूँ है ।
बार-बार कर्ता होने का मेरे,
भाव हमेशा उठता ही क्यूँ है ।
क्या करूँ मैं प्यारे दाता,
तुमसे ही पूछा करती हूँ ।
तुम कहते हो करो समर्पण,
"मन को"जो मैं ना कर पाती हूँ ।
"तेरी इच्छा-तेरी इच्छा,"
ऐसा भाव प्रबल करना ।
तेरी इच्छा में ही सब कुछ,
मैं और मेरा मिला देना ।
तेरी इच्छा का भाव प्रबल,
होने पर ही मैं मिट पाता है ।
केवल गुरु ही करते हैं सब,
ये विश्वास अटल हो जाता है ।
जैसी तेरी इच्छा हो दाता,
वैसा ही तुम तो कर देना ।
अंहकार का करूँ विसर्जन,
मुझपै ऐसी कृपा तुम करना ।
.......क़दमों में मुझे डाले रखना ।
.....शक्ति सदा देते रहना ।
👣🙏🏻
21/2/18
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