ब्रज की होली(आध्यात्मिक)-185
ब्रज की होली मस्ती की होली,
लठा मार हुआ करती है ।
गोपियॉ कृष्ण सँग खेलें होली,
ऐसी होली हुआ करती है ।
रँग-बिरंगी लहरियॉ मेरी,
ऑखों के आगे नाचा करती हैं ।
इन्द्र धनुष की छाया मेरे,
दिलो दिमाग़ पर आ पड़ती है ।
मेरा दामन तरह-तरह के,
रँगों से भर जाया करता है ।
तभी तो मेरा अँगना प्यारे,
तेरी ही राह तका करता है ।
होली का त्यौहार ही ऐसा,
अपना जैसा ही लगता है ।
तुम आओ या ना आओ प्यारे,
दिल तो तुम्हीं में लगा रहता है ।
आ जाते तो अच्छा होता,
सब सखियॉ मिल गीत सुनातीं ।
तरह-तरह के रँग-बिरँगे,
मिलकर तुम पर फूल चढ़ातीं ।
........होली का त्यौहार मनाती ।
......तुमको देख ख़ूब हर्षाती ।
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें