भाव भरी पुलकन के आगे(आध्यात्मिक)-206

भाव भरी पुलकन के आगे,
शब्द कहीं खो से जाते हैं ।
गहरे में कहीं उतर गये हैं तो,
बार-बार भावुक हो जाते हैं ।

             कहते हैं शब्दों से ज़्यादा,
             भाव प्रबल हुआ करते हैं ।
             ऐसा कुछ तो पता नहीं बस,
             तुमको हम प्रेम किया करते हैं।

मौन भाव में तुम्हें देखकर,
ऑंखें जब बोला करती हैं ।
तुम न सामने होते हो मेरे,
फिर भी महसूस किया करती हैं।

दिल भी कुछ कहना चाहता है,
कहते देखा ना कभी भी उसको।
ऑंख के आगे दिल भी बेबस है,
कैसे बोले....भला वो सबको ।

कितना पीछे पड़ती हूँ मैं भी,
तुम आ जाओ अब बाहर भी ।
सड़क पड़ी है पूरी ही ख़ाली,
रहोगे कब तक यूँ अन्दर भी ।
         .....आ जाओ तुम बाहर भी ।
             .....दिल से निकलो बाहर भी ।

                             👣🙏🏻
                      10/2/18

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