चरणों में तेरे गुलाल लगाना(आध्यात्मिक)-204
चरणों में तेरे गुलाल लगाना,
अलग ही रंग भर देता है ।
होली पर तेरे दर पर आना,
मन को ख़ुश कर देता है ।
कैसे बताऊँ कैसे सुनाऊँ ,
होली की ख़ुशहाली को ।
चरणों में बैठके गाया करते,
होली के कुछ गानों को ।
क्या ही रँगत क्या ही शोभा,
तेरे दर की हुआ करती ।
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं,
वो यादें बहुत आया करतीं ।
रंग-बिरंगे फूलों से जब तुम,
पूरे ही ढक जाया करते थे ।
"हिन्द रुस्तमे" मेरे तुम क्या,
ख़ूब ही ख़ूब लगा करते थे ।
सिर से नख तक अब भी तुमको,
मैं सारे रँग लगाती हूँ ।
गीत सुनाकर अब भी तुम्हारे,
साथ मैं होली मनाती हूँ ।
....रँग भी ख़ूब लगाती हूँ ।
.....मन ही मन हर्षाती हूँ ।
👣🙏🏻
24/2/18
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें