धुंधली यादें(व्यक्तिगत)-220
छोटे शरारती बच्चों का उछलना कूदना
देखकर लौटा लाता है फिर से
वही पुराना बालमन-वही शरारतें
इस ढलती काया में कोई बच्चा
फिर से जी उठता है-कहता है
चढ़ जा पेड़ पर,अरे खेल न कँचे
देख न..अब लँगड़ी टॉग कोई नहीं खेलता
चल-आ-जा,मान कहना,खेलते हैं
ख़्वाबों की झड़ी टूटती है तो लगता है
कि..अरे ये उम्र भी सठिया सी गई है
12/2/18
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