कोई कहे अपनों ने लूटा(आध्यात्मिक)-254

कोई कहे अपनों ने लूटा,
किसी-किसी को ग़ैरों ने ।
मैंने तुझे जिस दिन से पाया,
लूटा तुझे बस उस दिन से ।

तुझसे मिली तब जोगन थी मैं,
अब हो गई मैं अलग ही नारी ।
छाप-तिलक सब छोड़ के मैं तो,
हो गई हूँ बस तेरी ही प्यारी ।

तन-मन मेरा सब रंग डाला,
प्यार के पहनाये तूने गहने ।
भीतर-बाहर एक कर दिया,
क्या-क्या कहूँ तेरे मैं कहने ।

सारे जहॉ को छोड़ के मैंने ,
तुझको ही है अब तक लूटा ।
तेरी ही रंग में रंग गये पत्ते,
और रंगा छाप से बूटा-बूटा ।

मेरे कन्हैया क्या कुछ बोलूँ,
क्या-क्या बात बतलाऊँ मैं ।
तेरे नशे में चलती रहूँ बस,
तेरी ही होकर रह जाऊँ मैं ।
........विरह के गीत न गाऊँ मैं ।
........पलकों पर सो जाऊँ मैं ।

                        👣🙏🏻
                    1/2/18

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