धुंधली यादें(आध्यात्मिक)-219
गुज़रे तुम्हारे साथ जो लम्हे,
यादें आज भी बाक़ी है ।
सूफ़ियाना महफ़िलों का लगना,
मँजर की यादें ताज़ी हैं ।
मेरे मुर्शिद..तेरे क़दमों में,
"कलाम-अल्लाह"पढ़ा करते ।
लफ़्ज़ों के एहसास को लेकर,
उनपर तुम भी मेहरबाँ हुआ करते ।
वो क्या ही वक़्त निराला था,
तुम सामने बैठे होते थे ।
दोनों हाथ उठाकर अपने तुम,
ढेर दुआयें दिया करते थे ।
"अल्लाह"को मैंने ना जाना,
"अल्लाह"से ना ही याराना ।
तू ही "अल्लाह"बना मेरा,
तुझसे ही तो मेरा याराना ।
मैं भूल न पाती हूँ तुमको,
तुम भी ना मुझको भुला देना ।
मुझे रोग लगा याद आने का,
इस मर्ज़ की दवा भी दे देना ।
.....मैं भूल न सकूँ कुछ कर देना ।
.......क़दमों में ही डाले रखना ।
👣🙏🏻
12/2/18
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