कैसे-कैसे चक्र घुमाकर(आध्यात्मिक)-236
कैसे-कैसे चक्र घुमाकर,
तुम रहते हो घर के भीतर ।
तरह-तरह के रंग दिखाकर,
महकते हो काया के भीतर ।
कभी केसरी रंग का बाना,
पहने ख़ूब ही जँचते हो ।
काहे को मेरे मन के भीतर,
तुम वैराग्य भरा करते हो ।
कभी-कभी तुम हरा पहनकर,
साईं भी बन जाते हो ।
तुम्हें देखकर हँसी जो आ जाये,
तो हँसकर पास बुलाते हो ।
काले रंग के बादल से तुम,
जब भी झॉका करते हो ।
मैं तो तुम तक पहुँच न पाती,
तुम्हीं उड़ान भरा करते हो ।
रंग सफ़ेद तुम पर है फबता,
सबको सुरक्षा दे जाता ।
होली पर सारे रंगों का,
मेल तो मुझको बहुत भाता ।
..........खेलें होली आओ दाता ।
.........सबकी झोली भर दो दाता ।
👣🙏🏻
12/2/18
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