घर की खूब तलाशी ले ली(आध्यात्मिक)-248
घर की ख़ूब तलाशी ले ली,
ख़ूब ग़मों को ढूँढा मैंने ।
नहीं पता वो ग़मों का बक्सा,
छुपा रख दिया कहॉ है तुमने ।
वृन्दावन के नन्दनवन में,
तुम अब भी रास रचाते हो ।
मुझको लेकिन कभी-कभी,
तुम बहुत ही नाच नचाते हो ।
ख़ुशियाँ देने के चक्कर में,
तुम ग़मों को कहॉ रख आते हो ।
कभी न जाने कहॉ से लाकर,
इनका भी स्वाद चखा जाते हो ।
मेरे कन्हैया आज बता दो,
ये सब तुम कैसे कर लेते ।
हम तो सुख-दुख दोनों में से,
किसी एक से यारी कर लेते ।
सुख-दुख में बैलेन्स बनाना,
अब तक समझ नहीं आया ।
गणित भी अब तक समझ न आया,
पर तेरा साथ बहुत ही भाया ।
👣🙏🏻
5/2/18
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