मस्ती के इस मस्त सफर में(आध्यात्मिक)-244
मस्ती के इस मस्त सफ़र में,
ग़मों को साथ लेकर क्यूँ चलें ।
साथ मेरे जब तलक है तू ही,
बरसात लेकर के क्यूँ चलें ।
ऑधियॉ-तूफ़ान तो हरदम,
आते ही रहते हैं मगर ।
तूने थमाई छतरी जो,
उसको लगाकर के चलें ।
जब कभी ठोकर लगी तो,
थाम आकर के लिया ।
तूने जो निसबत निभाई,
औरों को ले के क्यूँ चलें ।
ऑखों से छलकती मस्ती को,
अश्कों से भिगोकर क्यूँ चलें ।
हुआ ख़ुशी से दिल तो पागल,
पगलापन लाने ही चले चलें ।
मेरे दाता तेरी मस्ती का,
ये आलम मुझ पर बना रहे ।
तुम छोड़ अकेले ना जाना,
हम साथ-साथ ही चले चलें ।
👣🙏🏻
7/2/18
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