धुंधली यादेंआध्यात्मिक)-217
भूली बिसरी सब यादों का,
एक साथ पिटारा आ जाता ।
कितनी सुन्दर यादों को लेकर,
वो साथ मेरे लग ही जाता ।
जब शरण में तेरी आई थी,
वो नादानी और बचपन था ।
जब चरणों में आकर बैठी तब,
तुमने दिया वो अपनापन था ।
उस प्यार ने ही मुझको तब,
कितना ही काम सिखाया था ।
कभी इधर भाग,कभी उधर भाग,
दुनिया को ख़ूब ही घुमाया था ।
ये काम और सैर ने ही तो,
एक नई दिशा दिखलाई थी ।
जब थककर के मैं चूर हो गई,
तब ही अन्तर्दशा दिखलाई थी ।
गुरूदेव तुम्हारा सपनों में आना,
कँधे पर बिठा दीपक जलवाना ।
ख़्वाबों में आके उँगली पकड़कर,
ख़ूब घुमाकर ले आना याद करो ।
.......उन हर लम्हों को याद करो ।
....मस्ती में रहकर ही ध्यान करो ।
👣🙏🏻
14/2/18
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