धुंधली यादें(आध्यात्मिक)-218
तुम सामने मेरे चले गये,
और मैं देखती ही रह गई ।
रात घनेरी थी कितनी,
दामन ही भिगोकर चली गई ।
मत पूछो मुझसे उनकी बातें,
वो बातें ही तो छोड़ गये ।
अपनी यादों के चिलमन में
वो यादें गुलिस्ताँ छोड़ गये ।
जब सामने बैठे होते थे,
क्या जलवा बिखेरा करते थे ।
सब बुत के माफ़िक़ हो जाते,
माशूक़ा बन जाया करते थे ।
इक तिरछी नज़र जिसपै डाली,
वो शर्म के मारे झुक जाता ।
ऐसी चितवन से ही मेरे दाता,
तुम प्यार लुटाया करते थे ।
कितनी बातें इस ज़हन में हैं,
कितनी ही यादें मैं साथ रखूँ ।
तुमको ना एहसास ज़रा सा भी,
तुम क्या-क्या लेकर चले गये ।
👣🙏🏻
6/2/18
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