फागुन का महीना आते ही मुझको(आध्यात्मिक)-242
फागुन का महीना आते ही मुझको,
जाने क्या-क्या हो जाता है ।
रोंआ-रोंआ खिल उठता है मेरा,
प्रेम का झरना बहता जाता है ।
बिन पीये भी पीने का,
एहसास बना ही रहता है ।
तरह-तरह के रंगों का,
दरिया सा दिखने लगता है ।
रात में जब में बाहर निकलूँ,
चन्दा-तारे रंग-बिरंगे दिखते ।
तेरे नशे में चूर वो सारे,
मुझको साथ नचाया करते ।
रोम-रोम में मेरे पुलकन,
सिहर-सिहर सी उठती है ।
तुझे सामने पाकर दाता,
वो और निखरने लगती है ।
तेरी यादों और रंगों का मुझपै,
नशा है हरदम चढ़ा ही रहता ।
हर रंग मुझसे बात है करता,
तेरी ही याद दिलाता रहता ।
.....मुझ पर रंग बरसाता रहता ।
......गीत प्यार के गाता रहता ।
👣🙏🏻
8/2/18
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