सिर के ऊपर से नीचे तक(आध्यात्मिक)-255
सिर के ऊपर से नीचे तक,
जब छाया तुम्हारी पड़ती है ।
लगता जैसे ठोस आवरण से,
मुझको वो हरदम ढकती है ।
बुलेटप्रूफ़ कर देते हो तुम क्यूँ ,
डर क्या कोई सताता रहता है।
दुनिया के रक्षक हो प्यारे तुम,
क्या..?ऐसे भी कोई समाता है ।
मैंने नहीं देखा है मीरा को,
क्या ऐसे ही सँग रहते थे ।
जब चाहे ढक देते थे उसको,
जब तक चाहे दिखने देते थे ।
क्या-क्या ढँग तुम्हारे न्यारे,
देख-देखकर हँसती रहती हूँ ।
जैसे कोई मॉजता है बरतन,
ऐसे ही हरदम मँजती रहती हूँ
ग़ज़ब शरारती हो तुम कन्हैया,
क्या-क्या बातें आज गिनाऊँ मैं ।
लखचौरासी भटकते थक गई हूँ,
कैसे इन सबसे पिन्ड छुड़ाऊँ मैं ।
तुम्हें तो दिल की बात पता है,
फिर क्यों तुम ख़ूब छकाते हो ।
किस तरह होऊँ विलय मैं तुझमें,
तुम क्यों ना मुझको बतलाते हो ।
👣🙏🏻
1/2/18
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