तेरी हर बात को मैं(आध्यात्मिक)-249
तेरी हर बात को मैं,
गुनगुनाना चाहती हूँ ।
याद जो ज़हन में आये,
वो बुदबुदाना चाहती हूँ ।
पास में बैठो अग़र फिर,
कुछ गीत गाना चाहती हूँ ।
प्यार के लम्हों में फिर से,
खो ही जाना चाहती हूँ ।
होंठ फिर से फड़फड़ायें,
याद आकर के तुम्हारी ।
गुफ़्तगू बस हो तुम्हारी,
ऐसा हर पल चाहती हूँ ।
सामने तुम आ ही जाओ,
सजदा है करना फिर मुझे ।
अश्क़ ऑखों से गिरें फिर,
ऐसा ही लम्हा चाहती हूँ ।
मौन हूँ मैं भी और तुम भी,
अल्फ़ाज़ ना कुछ दरमियाँ ।
दिल से दिल की बात हो,
ऐसी फ़िज़ा फिर चाहती हूँ ।
मौत भी आये अगर तो,
याद हो दिल में तुम्हारी ।
आज पिय के पास फिर मैं,
लौट जाना चाहती हूँ ।
.....ख़ुश होके जाना चाहती हूँ ।
👣🙏🏻
4/2/18
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