आंखन देखी(सामाजिक)-221
काम वाली बाई का बेटा
दूर हॉस्टल में पढ़ता है
बेटियाँ दो हैं
जो घर पर ही रहती हैं
बेटा बुढ़ापे का सहारा है
ये सोचकर पढ़ाती है
आगे का सोचकर
वर्तमान को घिसे जाती है
कितना ही समझाया
प्यार से बताना चाहा
लेकिन
लौट के उसका जबाब आया
अरे..मैडम जी...
आप नहीं समझोगे
आप क्या जानो
बेटा घर का चिराग़ है
बेटियों का क्या है?
वो तो पराया धन है
मैडम जी
मैं भी तो दसवीं पास हूँ
क्या कर रही हूँ देख लो ?
आदमी मेरा पड़ा है घर में
मैं निकलती हूँ
सुबह के पॉच बजे
दिन भर खटाती हूँ
इस तन को
थकी हारी लौटती हूँ
रात के नौ बजे
घर वाले भी
काम के इन्तज़ार में
राह देखते हैं मेरी-
खाना बनाऊँ खिलाऊँ
मेरी बेटियों को भी
उनका आदमी
यही सब करायेगा
क्या करूँ पढ़ाकर
मैं चुप हूँ.....
अपनी पुरुष प्रधान व्यवस्था पर
और वो......लगातार बोल रही है
17/2/18
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