जीवन है(सामाजिक)-299
जीवन है एक धूप - छॉव,
इससे तुम ना घबराना।
जब भी चाहो, जब भी सोचो,
बस आस - पास हमको पाना।
बेशक....? जीवन की कुछ कटु स्मृतियाँ,
तुमको हर वक्त सतायेंगी,
पर..... सोच के देखो तुमने भी,
पाईं हैं कितनी ही खुशियॉ।
संसार है मायाजाल तभी तो,
बार - बार दोहराते हैं,
जीवन के झंझावातों में हम,
समझ कहॉ यह पाते हैं,
जप-तप-ध्यान समाधि का,
अब अवसर है अच्छा आया,
बस आत्म - निरीक्षण करना है,
कहीं टूट न जाए ये काया,
जो बोया है वह काटोगे,
यह बार - बार दोहराना है।
प्रभु! मेरा है, मैं तेरी हूॅ,
बस यह अहसास कराना है।
कौन किसी के बेटे - बेटी,
पति - पत्नी हैं कौन कहॉ।
लेना - देना है जीवन का,
बस इसीलिए आये हैं यहॉ।
पद-पैसा-प्यार-प्रतिष्ठा भी,
मिलती है किस्मत वालों को।
जो इसमें भी सत्कर्म करे,
तब सच्ची मानवता जानो।
"सेवानिवृत"कर रहे तुम्हें,
पर सेवा तो अब शुरु हुई।
अब तक सेवा घर - बाहर थी,
अब सेवा पूरी वसुधा की।
तुम जहॉ रहो जैसे भी रहो,
बस अच्छे पल ही रखना याद।
तुम हमसे दूर नहीं हो सकती,
हम भी होंगे तुम्हारे साथ।
अध्यापिका की सेवानिवृति पर लिखी 2/2/08
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