दया के सागर(आध्यात्मिक)-10

दाता आप दया के सागर,
अब तक है ये रीती गागर।
गगरी चटक फूट जायेगी,
फ़िर ना ये मिलने पायेगी।
जनम - जनम में, बार - बार में,
आपको ही फ़िर ढूॅढना होगा।
गगरी की औकात भला क्या,
मिट्टी में वो मिल जायेगी।
सागर में रहकर भी गागर,
ऊपर - ऊपर तैर रही है।
 अपने खाली होने पर भी,
तरह - तरह से नाच रही है।
वो क्या जाने पगली इन,
दुनियॉ के रीत रिवाज़ो को।
सागर जब आगोश में लेगा,
तब जानेगी दुनियॉ को।
उसकी दुनियॉ सागर है बस,
सागर को है भान कहॉ।
खाली गगरी-फूटी गगरी को,
और है लेगा कौन यहॉ।
सागर ही इतना गहरा है,
अपने में सबको रख लेता।
अन्दर में कितनी हलचल है,
ऊपर से वो शान्त है दिखता।
 दाता प्यारे मुझको तुम,
अपने जैसा शीतल कर दो।
भीतर - बाहर के अवगुण तुम,
दूर छिटक कर बाहर कर दो।
 रात अॅधेरी होने वाली,
इस जीवन की अब दाता।
अन्दर की सब प्यास बुझा दो,
मेरे केवल तुम दाता।
                        - - - - - - - - - - 20/1/09
     
                                       👣🙏

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