तुम मुझको जब चाहे(आध्यात्मिक)-309
तुम मुझको जब चाहे,
मिटा सकते हो।
तेरी तस्वीर पै जो लिखा है,
मैं वो मिटाऊॅ कैसे।
मैं तो मुर्दा हूॅ,
बेदम सी पड़ी रहती हूँ।
तुम ही चलाते हो मुझे,
ये जानकर सब सहती हूॅ।
जब भी तुम फूॅक
लगा देते हो मुझमें।
चल पड़ती हूॅ में भी,
नक्शे कदम पै तुम्हारे।
जैसे ही तुम खींच लेते हो
अपनी ताकत।
मुर्दे की अकड़ मुझमें,
बस बरकरार रहती है।
अभी तक तो मुझे ठीक से,
चलना भी नहीं आया है।
दम पै तुम्हारे आज भी
उठने की कोशिश करती हूँ।
तुमसे चिराग रोशन है,
आज मेरी दुनिया के।
तुम मुझसे उनको,
बुझाने की बात कहते हो।
कहती हूँ तुमको बार - बार,
मुझको पकड़कर रखना।
धीरे - धीरे ही सही,
मुर्दे में जान तुम देते रहना।
फ़िर भला मुझको,
दुनियॉ क्या मिटायेगी।
मुझको जब देखेंगे तो,
मेरे "आका" की याद आयेगी।
- - - - - - - 28/7/11
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