रोग-शोक(आध्यात्मिक)-312

रोग - शोक और पाप - ताप सब,
हरण करो मेरे दाता।
तन और मन को संयम करना,
मुझको और नहीं आता।
आता ना मुझको कुछ भी है,
आडम्बर रचती ये काया।
तन - मन मेरा सब खाली है,
फिर भी छूट न पाये माया।
अन्तिम पल कोई काम न आता,
साथ न जाती ये काया।
केवल आप - आप ही सब कुछ,
फिर मन क्यूॅ ये भरमाया।
राग - व्देष - और लोभ - मोह को,
तुम ही दूर भगा सकते।
मेरे सारे प्रारब्धों को,
तुम ही जड़ से कटा सकते।
सहने की शक्ति दे दो बस,
ऐसी कृपा करो दाता।
मॉगू क्या मैं तुमसे मॉगू,
और न कुछ मुझको आता।
तुम मेरे, मैं तेरी हूॅ बस,
इतना भान ही मुझको है।
ना कोई मेरा, मैं ना किसी की,
इतना ज्ञान ही मुझको है।
सारी व्यवस्था देख रहे हो,
घर भीतर और बाहर की।
फिर क्यों मुझको चिन्ता रहती,
चारों तरफ के घेरे की।
चिन्ताओं से मुक्त करो तुम,
मेरे दु:ख हरण दाता।
प्राणों में तुम प्राण डाल दो,
मेरे प्राणेश्वर दाता।
                       - - - - - - - - - - 24/1/09

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