जीर्ण-शीर्ण नैया है मेरी(आध्यात्मिक)-310

जीर्ण-शीर्ण नैया है मेरी,
तुम हो खेवनहार।
पार लगा दो नैया दाता,
करती हूॅ मनुहार।
मॉ जैसा कुछ कर ना पाई,
बच्चों को मैं प्यार।
अब तक बच्चा बनी रही मैं,
सबसे मॉगा प्यार।
पत्नी जैसा भाव समर्पण,
रहा है कोसों दूर।
फि़र भी तुमने राह दिखा दी,
चलती रही बदस्तूर।
शिष्या गुरु की कहने को हूॅ,
काम न कुछ कर पाती हूॅ।
काया - माया साथ छोड़ती,
फ़िर भी मैं भरमाती हूॅ।
गुरू की कृपा आपका संबल,
मुझको पार लगायेगा।
प्यार आपका ऊॅगली पकड़कर,
मुझको फ़िर चलवायेगा।
जैसी भी हूॅ, शरण में हूॅ बस,
शरणागत को अपना लेना।
पतिता हूॅ, पापी भी हूॅ,
जैसे हो पार लगा देना।
तुमने पार लगाया ना तो,
बेदर्दी तुम कहलाओगे।
नैया को मझदार छोड़ तुम,
चैन कहॉ से पाओगे।
                           - - - - - - - - - - 24/4/09

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