जब चिड़िया चहचहाती(आध्यात्मिक)-290

जब चिड़ियाॅ चहचहाती,
घर अपने लौट आती।
मन्दिर के घण्टे बजते,
जब कुत्ते भोंका करते।
तब रोना ख़ूब आता,
मन समझ कुछ ना पाता।
लगता कि दिन ढला है,
अब सॉझ हो चली है।
जीवन की मेरी बाती,
यूॅ बुझने को चली है।
तुम आये ना सॉवरिया,
मेरी ली ना कुछ खबरिया।
सब लौट घर को आये,
पर तुम अभी ना आये।
बिन तुमको देखे मेरी,
ये नैया डूब जायेगी।
नौका में तेरी बैठे,
क्या ख़ाली हाथ जायेगी।
हर शाम मेरी इस तरह,
क्या सूखी ही रहेगी।
हर रात ऑसुओं से
यूॅ भीगती रहेगी।
कुछ तो बताओ बोलो,
क्यूॅ निर्दयी हुये हो।
जलती है सूखी बाती,
तुम तेल औ दिये (दीपक) हो।
  बिन तेल सूखी बाती,
कब तक यूॅ जलेगी।
  "आधार" बिना जिन्दगी,
ऐसे ही क्या चलेगी।
  दिन - रात बीते जाते,
पलकों को यूॅ बिछाते।
  आ जाओ प्यारे दाता,
अब यूॅ न रहा जाता।
                         - - - - - - - - - 25/1/09

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