आराम यूँ दिया है(आध्यात्मिक)-289

आराम यूॅ दिया है,
फ़िर भी नहीं आराम।
एकान्त यूॅ दिया है
, मन भरता है उड़ान।
तुम साथ हो तो मेरे,
मुश्किल भी कुछ नहीं है।
बस व्दार पर ये दासी,
मेहमान सी पड़ी है।
यूॅ व्दार पर तो तेरे,
जन - जानवर भी रहते।
पर हमसे ये "भिखारी",
दर कस के पकड़े रहते।
खटमल और चूहे भी,
साथ तो हैं रहते।
हम श्वान की तरह ही,
दर पर पड़े तुम्हारी।
तुम डॉटो या मारो,
पुचकारो या खिलाओ।
दुम यूॅ ही हिलती होगी,
बस शान में तुम्हारी।
टुकड़े तेरे हैं खाकर,
यूॅ जान है निछावर।
गद्दार न होने पायें,
बस आन में तुम्हारी।
चाटते रहें हम,
चरणों की धूल को यूॅ।
मालिक की प्रार्थना हो,
कुछ इस तरह हमारी।
  इस श्वान के सिर पर,
"आका" का हाथ होगा।
  झूमेगा वो खुशी से,
देखेगी दुनियॉ सारी।
  शेबू और शीबा (पालतू कुत्ते)
रहते हैं घर हमारे।
  ऐसी ही एक शीबा,
दर पर पड़ी तुम्हारे।
  दाता हमारे आका,
आये शरण तुम्हारी।
  इस श्वान की है डोरी,
अब हाथ में तुम्हारे।
                       - - - - - - - - - - - 20/1/09

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