बार- बार(आध्यात्मिक)-307

बार - बार याद आने से,
जप हो जाता है।
सामने जब होते हो,
तो ध्यान हो जाता है।
रोती हूॅ जब बिलखकर,
तो यज्ञ हो जाता है।
चरणों को जब दबाती हूॅ,
तो सब कुछ हो जाता है।
अब तुम्हीं कुछ बताओ,
मैं कौन सी पूजा करूॅ।
पूजा - विधा के नाम पर,
ना जाने क्या हो जाता है।
तुम्हीं को पाने के लिए,
करती थी सारे यतन।
तुमको जब पा लिया तो,
मन न जाने किधर जाता है।
अच्छी हूॅ या बुरी हूॅ,
ये तुम ही जानते हो।
कोई विधा न जानती,
बस तुमको मानती हूँ।
जो चाहो सो करा लो,
मैं तुझमें ही समायी।
बिकी हूॅ तेरे हाथों,
बस इतना जानती हूँ।
पूछेगा जब ख़ुदा भी....?
मेरा नाम तू लेती थी?
मैं बोल दूँगी.... मैंने....?
तुझको ख़ुदा बनाया।
बन्दी हूॅ तेरी मैं तो,
तुझमें ही ख़ुदा पाया।
मैं नासमझ हूॅ तेरी,
तूने ही मुझे चलाया।
                - - - - - - - - - 28/7/11

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